Thursday, June 21, 2018

छोटी- सी दुनिया के मुसाफिर हुए है सब
फुरसत   कहाँ है किसी को
बंद कमरों में सोये हुए घंटो बीत जाते है
मगर फुरसत  कहाँ है
दोस्तों के बीच रिश्तो को भूल जाने वाले
यू  मोबाइल में देखते-देखते घंटो बीता देते है
मगर रिश्तो की नीऊ सजोने की फुरसत कहाँ  है......


यु  तो सपनो में समुद्र से मोतिया इकट्ठे कर लेते है
मगर रिश्तो को इक्कठा करने की फुरसत कहाँ  है
घंटो चाय के साथ गपशप कर लेते है
मगर एक चीख उन चिडियो की सुनने की फुरसत कहाँ है
यु तो पेड़ के नीचे सुकून से बैठते है
मगर उनके जैसा उगाने की फुरसत कहाँ है
रास्तों पर पड़े पथरो को समेटने की फुरसत कहाँ है
यहाँ लोगो  को रिश्तो की नीऊ सजोने की फुरसत कहाँ है


चीख रही है वो उन दरिंदो के हाथ में
मगर उसे सुनने की, उसका दर्द बाटने की फुरसत  कहाँ  है
दुकान से लेके मोमबतियां जलाई तो जाती है
मगर इसके आगे लोगो को फुरसत  कहाँ है
रुख़्सत हो जाते है सब अपने काम के  बाद
दुसरो के लिए फुरसत कहाँ है
यहाँ इंसान को अपने अलावा फुरसत कहाँ है..... 


वो पसीने से लतपथ अनाज उगा रहे
उनका हाल-चाल पूछने की फुरसत कहाँ है
गुमशुम-से बैठे रहेंगे दिन भर
एक पल मुस्कुराने की फुरसत कहाँ है
दुनिया के मुसाफिर हुए है सब
दुसरो के लिए फुरसत कहाँ है
टूटे पत्तो (रिश्तो) को समेटने की फुरसत कहाँ है
यहाँ इंसानो को अपने अलावा फुरसत कहाँ है..... .

                                                                               -ममता गुप्ता 

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